बिहार के 34 जिलों में 10 फरवरी से एमडीए राउंड, ‘स्थानीय योद्धा’ रच रहे सफलता की नई इबारत

राज्य के 34 जिलों के 395 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट में संचालित होगा एमडीए
प्री-टास के सफर में सीएचओ लीड रोगी हितधारक मंच (पीएसपी) ने रची सफलता की नई इबारत

पटना। राज्य को फाइलेरिया मुक्त बनाने की दिशा में स्वास्थ्य विभाग एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आगामी 10 फरवरी से बिहार के 34 जिलों की 396 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट ( आईयू ) में सर्वजन दवा सेवन अभियान का आगाज होने जा रहा है। हाल ही में आए ‘नाइट ब्लड सर्वे’ के परिणाम विभाग के लिए बड़े उत्साहजनक रहे हैं, क्योंकि राज्य के 108 आईयू अब ‘प्री-ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे’ की श्रेणी में आ गए हैं। इसका तकनीकी अर्थ है कि इन क्षेत्रों में फाइलेरिया संक्रमण की दर (माइक्रोफाइलेरिया रेट) अब 1% से भी कम रह गई है, जो इस बात का प्रमाण है कि संक्रमण की कड़ी टूट रही है। वहीं 90 आईयू टास 1 में आ चुके हैं।


फाइलेरिया राज्य सलाहकार डॉ. अनुज सिंह रावत ने बताया कि इस बार 19 जिलों में डबल ड्रग और 15 जिलों में ट्रिपल ड्रग थेरेपी दी जाएगी। इस सफलता का एक बड़ा श्रेय स्वास्थ्य विभाग के उस सीएचओ लीड रोगी हितधारक मंच (पीएसपी) को जाता है, जिसने ‘ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ (स्वास्थ्य कर्मी की उपस्थिति में दवा खिलाना) को एक जन-आंदोलन बना दिया है।
इस अभियान की जमीनी हकीकत और सफलता को उन स्थानीय योद्धाओं के कार्यों से समझा जा सकता है जिन्होंने अपनी सूझबूझ से समाज की सोच बदल दी है। इसी क्रम में अरवल जिले के करपी प्रखंड में जीविका के एमआरपी कवेन्द्र कुमार ने एक मिसाल पेश की है। उन्होंने हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के माध्यम से सीएचओ लीड पीएसपी को सहयोग दिया और जीविका दीदियों के साथ मिलकर बेलखारा, शहर तेलपा और रामपुर चौर जैसे क्षेत्रों में करीब 2000 से अधिक परिवारों को सीधे स्वास्थ्य लाभ पहुँचाया। उन्होंने फाइलेरिया रोगियों की पहचान कर उन्हें मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
वहीं, औरंगाबाद जिले के बारुण प्रखंड में शिक्षा और स्वास्थ्य का अनूठा संगम देखने को मिला है। यहाँ मध्य विद्यालय कंचनपुर के प्रधानाचार्य दीपक कुमार पीएसपी सदस्य के रूप में एक प्रेरणा बन चुके हैं। वे न केवल बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं, बल्कि अभिभावकों को कालाजार और फाइलेरिया जैसे संक्रामक रोगों के प्रति जागरूक कर उन्हें समय पर दवा लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके प्रयासों से स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी की भावना जागृत हुई है।
सफलता की एक और महत्वपूर्ण कड़ी वैशाली सदर की एएनएम नीतू कुमारी हैं। जनवरी 2024 में पीएसपी से जुड़ने के बाद उन्होंने अस्पताल की चारदीवारी से निकलकर समुदाय के बीच पैठ बनाई। नीतू ने न केवल फाइलेरिया से जुड़ी भ्रांतियों को खत्म किया, बल्कि सेंटर पर मरीजों की संख्या में भी भारी इजाफा किया। उन्होंने प्रभावितों को एमएमडीपी किट वितरित करने के साथ-साथ उन्हें दिव्यांगता प्रमाणपत्र और पेंशन योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए आवेदन भी करवाए।
इन स्थानीय योद्धाओं का यह समर्पित प्रयास न केवल बीमारियों के प्रसार को रोक रहा है, बल्कि ‘सामुदायिक सशक्तिकरण’ के जरिए फाइलेरिया मुक्त राज्य के सपने को साकार भी कर रहा है।

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