सरकारी मदद और निजी इलाज मिलकर तोड़ रही बिहार में टीबी की कड़ी
अप्रैल से नवंबर 2025 तक के टीबी नोटिफिकेशन में से 58 प्रतिशत निजी क्षेत्र से
अप्रैल से नवंबर 2025 तक राज्य में 2 लाख 18 हजार 540 टीबी नोटिफिकेशन
पटना। राज्य सरकार टीबी मुक्त बिहार का स्वप्न साकार करने के लिए कई कदम उठा रही है. इनमे अधिक से अधिक संदिग्ध मरीजों को चिन्हित करना, टीबी के साथ एचआईवी संक्रमण वाले मरीजों की चिन्हित कर उन्हें चिकित्सीय उपचार से जोड़ना, डीबीटी ट्रांसफर से पैसों का भुगतान, निजी क्लीनिकों द्वारा मरीजों को चिन्हित करने का प्रयास, ड्रग रेसिस्टेंस की जांच एवं ड्रग रेसिस्टेंट मरीजों का उपचार प्रमुख है. इसका असर स्पष्ट तौर से देखने को मिला है. अप्रैल से नवंबर 2025 तक राज्य द्वारा जारी टीबी स्कोरकार्ड के अनुसार राज्य में में 2 लाख 18 हजार 540 टीबी मरीजों की पहचान की गयी है. वहीं, इस दौरान निजी अस्पतालों ने सरकारी अस्पातलों की तुलना में अधिक टीबी मरीजों को चिन्हित किया है. इस दौरान कुल चिन्हित मरीजों का 58 प्रतिशत निजी क्षेत्र से हुआ है. अप्रैल से नवंबर, 2025 तक के जारी आंकड़ों के अनुसार रैंकिंग में वैशाली प्रथम तथा बक्सर और कटिहार क्रमशः दुसरे और तीसरे स्थान पर है. वैशाली को उसके शानदार प्रबंधन के लिए 84.8 का उच्चतम स्कोर मिला है, जो राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की सुदृढ़ होती स्थिति को दर्शाता है. रिपोर्ट की सबसे सुखद तस्वीर सहरसा जिले से निकलकर आई है, जिसने मरीजों को चिन्हित करने के वार्षिक लक्ष्य के मुकाबले 151 प्रतिशत की उपलब्धि हासिल की है. यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण इलाकों में भी स्वास्थ्यकर्मी पूरी निष्ठा के साथ सरकार की योजनाओं को धरातल पर उतार रहे हैं.
निर्णायक भूमिका में प्राइवेट प्रैक्टिशनर
इस सफलता की कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘प्राइवेट नोटिफिकेशन’ (निजी क्षेत्र की भागीदारी) में आई जबरदस्त तेजी है। एक समय था जब निजी क्लीनिकों में इलाज करा रहे टीबी मरीजों का कोई रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं होता था, जिससे बीमारी के प्रसार को रोकना मुश्किल था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। अप्रैल-नवंबर, 2025 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल 2 लाख 18 हजार 540 टीबी नोटिफिकेशन में से 1 लाख 27 हजार 878 (लगभग 58%) अकेले निजी क्षेत्र से आए हैं,जो सार्वजनिक क्षेत्र (90 हजार 662) की तुलना में कहीं अधिक है। पटना और गया जैसे बड़े जिलों में निजी डॉक्टरों की सक्रियता ने ‘मिसिंग केस’ को खोजने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। निजी क्षेत्र का यह सकारात्मक सहयोग न केवल सटीक डेटा प्रदान कर रहा है, बल्कि अधिक से अधिक मरीजों को सरकारी योजनाओं और सही उपचार से जोड़कर बिहार को टीबी मुक्त बनाने के संकल्प को धरातल पर उतार रहा है। बड़ी संख्या में निजी अस्पतालों और डॉक्टरों ने टीबी के मरीजों की जानकारी सरकारी पोर्टल पर साझा की है, जिससे यह सुनिश्चित हुआ है कि चाहे मरीज कहीं भी इलाज कराए, उसे सरकार की ओर से मिलने वाली मुफ्त पोषण राशि और निगरानी का लाभ मिले।
वैशाली ने पेश किया ‘परफेक्ट हाइब्रिड मॉडल’
बिहार के सभी 38 जिलों के बीच जारी स्वास्थ्य सेवाओं की इस सकारात्मक प्रतिस्पर्धा में वैशाली जिले ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। वैशाली के जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ अजय लाल बताते हैं कि इस कामयाबी के पीछे स्वास्थ्य कर्मियों की वह कड़ी मेहनत के साथ ‘पीपीपी’ (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) है। यहाँ के जिला स्वास्थ्य तंत्र ने निजी क्लीनिकों के साथ मिलकर ‘निक्षय मित्र’ और नोटिफिकेशन प्रक्रिया को इतना सरल बना दिया है कि डॉक्टर इसे बोझ नहीं, जिम्मेदारी समझते हैं। यही कारण है कि वैशाली आज राज्य में पहले स्थान पर है। जहाँ अन्य जिले केवल सरकारी या केवल निजी आंकड़ों के सहारे हैं, वहीं वैशाली ने ‘परफेक्ट हाइब्रिड मॉडल’ पेश किया है। वैशाली में निजी क्षेत्र ने 5,763 मरीजों को नोटिफाई किया है, जो इसके सरकारी आंकड़े (2,061) से लगभग तीन गुना अधिक है। वैशाली का यह मॉडल पूरे बिहार के लिए एक प्रेरणा बन गया है, जो यह साबित करता है कि यदि सही रणनीति और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो किसी भी लक्ष्य को समय से पहले हासिल किया जा सकता है।
पटना जिले का अभिषेक ( बदला हुआ नाम ) का कहना है कि “सरकारी अस्पताल की दवाइयों और हर महीने समय पर मिलने वाली आर्थिक सहायता ने मुझे फिर से खड़ा होने की हिम्मत दी है। निजी क्लीनिक के डॉक्टर भी अब सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, तो मेरा भरोसा बढ़ गया। आज मेरा नाम सरकारी पोर्टल पर दर्ज है और मुझे न केवल मुफ्त इलाज मिला, बल्कि बेहतर खान-पान के लिए आर्थिक मदद भी सीधे बैंक खाते में पहुंची।”

