भाकपा-माले ने मनायी डॉ. अम्बेडकर की जयंती, दी श्रद्धांजलि
संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की लड़ाई को निर्णायक बनाने का लिया संकल्प
14 अप्रैल 2026, भागलपुर
भाकपा-माले व ऐक्टू ने डॉ. भीम राव अम्बेडकर की 135वीं जयंती मनायी। स्थानीय मोहनपुर स्थित बाबू जगदीश बौधी स्मृति आवास पर फासीवादी साम्प्रदायिक ताकतों को शिकस्त दो – डॉ. अम्बेदकर के सपनों का भारत बनाओ आदि गूंजते नारों के बीच उनकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित किया गया और उनकी याद में दो मिनट का मौन रख कर उन्हें श्रद्धांजलि दे, …संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की लड़ाई को निर्णायक बनाने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मितेश कुमार ने की।

पार्टी नगर प्रभारी व ऐक्टू के राज्य सचिव मुकेश मुक्त ने डॉ. अम्बेडकर को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि संविधान एक ऐसी जीवित व्यवस्था है जो देश के नागरिकों को बराबरी, स्वतंत्रता और न्याय का भरोसा देता है। किन्तु हमारे हुक्मरानों ने देश के संवैधानिक लोकतंत्र का भविष्य खतरे में डाल दिया है। वे अपने मुट्ठी भर मुनाफा–लौलूप कॉर्पोरेट आकाओं की सेवा में, उसके फायदे के लिए आम लोगों के अधिकारों को कुचल रहें हैं। हम सभी को डॉ. अंबेडकर के संघर्षों और विचारों से प्रेरणा और ताकत लेने की जरूरत है। हमें बिलकुल याद रखना चाहिए कि बाबा साहेब अंबेडकर ने हमें न सिर्फ संवैधानिक लोकतंत्र दिया, बल्कि उन्होंने हमें राजनीति में भक्ति के खतरों से भी आगाह किया था। इसे उन्होंने तानाशाही का नुस्खा बताते हुए कहा था कि अगर हिंदू राष्ट्र हकीकत बन गया तो हम पर बहुत बड़ी मुसीबत आएगी। आइए, हम उनकी जयंती के अवसर पर उनके विचारों को आत्मसात करें और संविधान और भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की रक्षा के लिए पूरे समर्पण और ताकत से काम करें।
उन्होंने कहा कि ऐसे दौर में जब भारतीय गणराज्य की संवैधानिक बुनियाद पर गंभीर हमले हो रहे हैं और दमनकारी सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों के पुनरुत्थान का माहौल बनाया जा रहा है, डॉ. अंबेडकर के संदेश और भी ज्यादा प्रासंगिक और हौसला बढ़ाने वाला है। भाजपाई हुक्मरानों ने लोकतंत्र, संविधान व धर्मनिरपेक्षता को क्षति पहुंचा कर माहौल को विषैला बना रखा है। आम जनता के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की गारंटी करने में नाकामयाब मोदी सरकार ने लगातार देश के मजदूरों - किसानों, छात्रों - युवाओं सहित देश के आम मेतनतकश नागरिकों को ठगने का काम किया है। चंदा का धंधा करने वाली भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकना हम सब प्राथमिक कार्यभार होना चाहिए। आज के दौर में इस कार्यभार को पूरा करना ही डॉ. अम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मितेश कुमार ने कहा कि 1920 के दशक तक इंग्लैंड और अमरीका में अपनी शिक्षा पूरी कर डॉ. अंबेडकर सामाजिक न्याय आंदोलन में एक अहम शख्सियत के बतौर उभरे। उन्होंने बुद्ध और कबीर के बाद फुले को अपना महान शिक्षक और प्रेरणा का स्रोत माना। 1927 वह निर्णायक साल था जब डॉ. अंबेडकर ने दो ऐतिहासिक कदम उठाए — मार्च में महाड़ सत्याग्रह, जिसमें बिना भेदभाव के सार्वजनिक वस्तु के बतौर पानी के अधिकार का दावा किया, और दिसंबर में मनुस्मृति को गुलामी की संहिता बताते हुए सार्वजनिक रूप से जलाया। 1936 में उन्होंने खुलकर 'जाति के विनाश' का आह्वान किया और स्वतंत्र लेबर पार्टी का गठन किया, जिसका उद्देश्य जाति और पूंजीवाद दोनों को खत्म करना था।
कार्यक्रम प्रमिला देवी, सपना कुमारी, प्रीतज, महेश प्रसाद दास, सुभाष कुमार, रवि कुमार, सोमराज कुमार, नूतन कुमारी, सपना कुमारी, कोमल कुमारी, नेहा कुमारी, पूनम देवी, अनिल पंडित, मनोज सिंह, कुसुम देवी आदि शामिल हुए।

