खेत-खलिहान-किसान की रोजी-रोटी पर हमला मंजूर नही!

कांग्रेस सांसद और CWC सदस्य दीपेंद्र हुड्डा का बयान

‘‘देशहित’’ ‘‘गिरवी’’ रख व्यापार समझौता ‘‘मंजूर नहीं’’ हो सकता!
खेत-खलिहान-किसान की रोजी-रोटी पर हमला मंजूर नही!
भारत की ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़ मंजूर नही!
भारत की संप्रभुता व आत्मनिर्भरता से समझौता मंजूर नहीं!

व्यापार समझौते आर्थिक तरक्की का रास्ता हैं। व्यापार समझौतों का आधार ही बराबरी की शर्तों पर परस्पर लोकहित है। व्यापार समझौते देश की संप्रभुता को त्यागकर गुलामी का रास्ता कदापि नहीं हो सकते। व्यापार समझौते की आड़ में देशहित ओर लोकहित की बलि नहीं दी जा सकती। भारत के 144 करोड़ जनमानस इसे स्वीकार नहीं करेंगे।

अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में मोदी सरकार ने भारत के किसानों व खेत-खलिहान के हितों की बलि दे डाली। भारत की ऊर्जा सुरक्षा से सरेआम खिलवाड़ किया। भारत की डिजिटल स्वायत्ता व हमारी डेटा प्राईवेसी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। भारतीय हितों की रक्षा में मजबूती से खड़े होने की बजाय, एक मजबूर सरकार ने भारत की संप्रभुता व आत्मनिर्भरता से समझौता कर लिया। लोग पूछ रहे हैं – ‘‘मजबूत सरकार’’ या ‘‘मजबूर सरकार’’! मजबूत सरकार। ‘आत्मनिर्भर’ भारत या ‘अमेरिका-निर्भर’ भारत।

मोदी सरकार द्वारा भारतीय हितों की तिलांजलि देने के विभिन्न पहलुओं को परखें

(I) खेत-खलिहान-किसान से विश्वासघात

  1. भारत के कृषि बाजार में अमेरिका के खेती व खाद्य उत्पादों का आयात किसान की रोजी-रोटी पर सीधा हमला।
  • अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के 6 फरवरी, 2026 के ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के पहले बिंदु में ही सहमति जताई है कि भारत बगैर किसी आयात शुल्क के अमेरिका के खाद्य व कृषि उत्पादों के लिए हमारा बाजार खोल देगा।
  • सबसे पहली चर्चा ‘‘ड्राईड डिस्टिलर ग्रेन’’ (DDG) के भारत में आयात की है। यह असल में प्रोसेस्ड मक्का है। भारत में 4.30 करोड़ मीट्रिक टन मक्का का उत्पादन 2025-26 में हुआ। भारत में मक्का कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, गुजरात में पैदा होता है।
    इसके विपरीत, अमेरिका 42.50 करोड़ मीट्रिक टन मक्का पैदा करता है। व उसे इसे बेचने के लिए भारत जैसा बड़ा बाजार चाहिए।

अगर अमेरिका से ड्यूटी-फ्री (शुल्क रहित) मक्के के लिए भारत का बाजार खुल जाएगा, तो देश के किसानों का क्या होगा?

  • व्यापार समझौते में इसके बाद अमेरिका से ‘ज्वार’ के आयात को खोलने बारे सहमति जताई है।
    भारत का ज्वार उत्पादन इस साल 52 लाख मीट्रिक टन है। भारत में ज्वार उत्पादन करने वाले सबसे बड़े प्रांत हैं, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व गुजरात।

इसके विपरीत अमेरिका 87 लाख मीट्रिक टन सालाना ज्वार उत्पादन करता है, जो दुनिया में सबसे अधिक है।

अगर अमेरिका का ड्यूटी-फ्री (शुल्क रहित) ज्वार भारत के बाजार में बिकेगा, तो फिर भारत के किसान का क्या होगा?

  • व्यापार समझौते में अमेरिका से ‘सोयाबीन ऑयल’ के आयात को खोलने बारे सहमति जताई गई है।
    भारत का सालाना सोयाबीन उत्पादन 153 लाख टन (साल 2024-25) है। भारत में सोयाबीन की पैदावार मुख्यतः मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व कर्नाटक में होती है।

इसके विपरीत, अमेरिका में 12 करोड़ मीट्रिक टन सालाना सोयाबीन का उत्पादन होता है।

क्या अमेरिका से ड्यूटी-फ्री (जीरो शुल्क पर) सोयाबीन आयात से भारत के साधारण किसान की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा?

  • व्यापार समझौते का बड़ा प्रभाव ‘‘कपास’’ पैदा करने वाले किसान पर पड़ेगा।
    9 फरवरी, 2026 को अमेरिका ने पड़ोसी देश, बांग्लादेश से व्यापार समझौता किया, जिसमें स्पष्ट तौर से कहा गया कि बांग्लादेश अमेरिकी कपास व धागा आयात कर जो कपड़ा व वस्त्र अमेरिका को निर्यात करेगा, उस पर अमेरिका में जीरो शुल्क लगेगा। इसके विपरीत, भारत जो कपड़ा व वस्त्र का बड़ा निर्यातक है, हमारे निर्यात पर 18 प्रतिशत शुल्क लगेगा। इससे तिरुपुर, सूरत, पानीपत, लुधियाना व पूरे देश के वस्त्र उद्योग पर भी विपरीत असर पड़ेगा।

12 फरवरी, 2026 को वाणिज्य मंत्री, श्री पीयूष गोयल ने सार्वजनिक तौर से देश को बताया कि भारत भी अमेरिका से कपास आयात कर जो कपड़ा वा वस्त्र निर्यात करेगा, उसे भी बांग्लादेश के बराबर राहत मिलेगी। यानी अब अमेरिकी कपास के भारत में निशुल्क आयात का दरवाजा भी मोदी सरकार ने खोल दिया है। दूसरी ओर, बांग्लादेश भारत से 50 प्रतिशत कपास का आयात करता है। अब कपास का भारत से बांग्लादेश को निर्यात भी बंद हो जाएगा। यह किसान पर डबल मार है।

मोदी सरकार ने पहले ही अमेरिका से भारत में कपास का आयात शुरू कर दिया है। साल 2024-25 में भारत ने अमेरिका से 378 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹3,428) कपास का आयात किया। इसके चलते ही भारत में कपास की कीमत MSP से ₹1,000 प्रति क्विंटल तक नीचे गिर गई।

अब अमेरिकी कपास का आयात होगा, तो देश, विशेषतः महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के कपास पैदा करने वाले किसान का क्या होगा?

दूसरी ओर, भारत से बांग्लादेश को सालाना 2.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹24,550 करोड़) कपास व धागे का निर्यात किया जाता है। जब बांग्लादेश अमेरिका से कपास व धागा मंगवाएगा, तो भारत के कपास उत्पादक किसान व कपड़ा बनाने वाले कारखानों का क्या होगा?

  • अगला बड़ा झटका भारत के फल और मेवा उत्पादकों यानी सेब, नाशपाती, अमरूद, संतरा, स्ट्रॉबेरी, केला आदि तथा बादाम, अखरोट, पिस्ता, मूंगफली और अन्य उत्पादकों को लगेगा क्योंकि अमेरिका से आयात को शुल्क-मुक्त किया जा रहा है।
    हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों के लाखों किसान इससे गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के केला और मूंगफली किसान भी प्रभावित होंगे।

सवाल यह है कि जब सभी फल और मेवे अमेरिका से शुल्क-मुक्त आधार पर आयात किए जाएंगे, तो हमारे किसानों की आजीविका की रक्षा कौन करेगा?

  • व्यापार समझौते के पहले बिंदु में अमेरिका से आयात किए जाने वाले खाद्य व कृषि उत्पादों में ‘‘एडिशनल प्रोडक्ट्स’’ (अतिरिक्त उत्पाद) लिखा है। ये अतिरिक्त उत्पाद कौन सा – कौन सा और अनाज है? क्या मोदी सरकार बताएगी कि पिछले दरवाजे से अमेरिकी अनाज आयात करने के और क्या-क्या समझौते किए गए हैं?
  1. अमेरिका से जेनेटिकली मोडिफाईड कृषि उत्पादों के आयात की अनुमति भारत के किसान के लिए घातक
  • भारत अमेरिका व अन्य देशों से GM कृषि उत्पाद आयात करने की अनुमति नहीं देता क्योंकि इससे भारत की ओरिज़नल बीज शुद्धता व बीज प्रजातियाँ नष्ट हो जाएंगी।
  • पर अगर भारत में प्रोसेस्ड मक्का, ज्वार, सोयाबीन व अन्य कृषि उत्पाद आएंगे, तो क्या उनका सीधा प्रतिकूल प्रभाव भारत की जैविक विविधता पर नहीं पड़ेगा? क्या मोदी सरकार ने पिछले दरवाजे से भारत में GM Crops के आयात न करने की नीति को छूट दे दी है? क्या भारत की जैविक विविधता व शुद्धता पर पड़ने वाले प्रतिकूल तथा दूरगामी प्रभावों का आकलन किया गया है?
  1. व्यापार समझौते में ‘नॉन-ट्रेड बैरियर्स’ को हटाने का मतलब – ‘किसान की सब्सिडी’ को हटाना व GM Crops को मंजूरी दे बीज शुद्धता व जैविक विविधता पर प्रश्नचिन्ह लगाना
  • व्यापार समझौते के पाँचवें बिंदु में साफ लिखा है कि अमेरिका की चिंताओं के अनुरूप भारत अपने नॉन-टैरिफ ट्रेड बैरियर हटाने की ओर बढ़ेगा।
  • अमेरिका अपने किसान को सालाना (साल 2025) अमेरिकी डॉलर 16 बिलियन (₹1.45 लाख करोड़) की सब्सिडी देता है। इसके विपरीत, भारत के किसान से ₹6,000प्रति किसान परिवार सालाना देकर वही सब्सिडी महंगे डीज़ल-खाद-बिजली-कीटनाशक दवाईयों के माध्यम से ₹25,000 प्रति हेक्टेयर तक वापस ले ली जाती है।
    इसके बावजूद भी व्यापार समझौते में बची-खुची किसान को मिलने वाली रियायत वापस लेने का फैसला पूरे किसान वर्ग के लिए वज्रपात साबित होगा।

(II) भारत की ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़

  • 6 फरवरी के व्यापार समझौते के बाद 6 फरवरी को ही अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत पर लगे 25 प्रतिशत पैनल्टी टैरिफ आदेश में लिखा कि भारत ने अमेरिका से वादा किया है कि वह अब रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदेगा। चौंकानेवाली बात यह है कि उसी आदेश के सेक्शन 4 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने लिखा कि वह भारत की निगरानी करेगा और अगर भारत ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रूस से कच्चा तेल खरीदा तो फिर भारत पर पैनल्टी दोबारा लगा देगा।
    9 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा जारी फैक्ट शीट में भी भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल न खरीदने का वादा करने बारे शर्त दोहराई।

अब 14 फरवरी, 2026 को ‘म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस’ में अमेरिका के विदेश मंत्री, श्री मार्को रुबियो ने अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कहा कि भारत ने रूस से कच्चा तेल न खरीदने का सशर्त वादा अमेरिका से किया है।

  • अमेरिका पहले ही मई, 2024 में पाबंदी लगा चुका है कि भारत ईरान से भी कच्चा तेल नहीं खरीद सकता, जिसे मोदी सरकार ने स्वीकार कर लिया है। ज्ञात रहे कि ईरान भारत को भारतीय रुपयों में कच्चा तेल बेचता था।
  • भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है, जो हमारी ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा है।
    भारत 40 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से व 11 प्रतिशत कच्चा तेल ईरान से आयात करता आया है, यानी अपनी कुल जरूरत का लगभग 51 प्रतिशत।

फरवरी, 2022 से जनवरी, 2026 के बीच भारत ने रूस से 168 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹15.24 लाख करोड़) का कच्चा तेल आयात किया और सस्ती दरों के चलते लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹1.81 लाख करोड़) की बचत हुई।

  • अब भारत को व्यापार समझौते के तहत अमेरिका से कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा, जिसमें रूस और ईरान के बराबर कम कीमतों का कोई आश्वासन नहीं है।
  • क्या यह सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता से समझौता नहीं?
    (III) व्यापार समझौते में भारत पर अमेरिका से 5 साल में 500 बिलियन डॉलर (₹45 लाख करोड़) का सामान खरीदने की पाबंदी क्या देशहित के अनुरूप है?
  • मौजूदा समय में (साल 2024) भारत ने अमेरिका को 81 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान निर्यात किया और 43 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान आयात किया। यानी, अमेरिका से भारत का ट्रेड सरप्लस 38 बिलियन डॉलर है। 13 फरवरी, 2025 को जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका गए और साझा बयान जारी हुआ, तो उसके पैरा 7 में यह कहा गया था कि दोनों देश अपना ‘‘परस्पर व्यापार’’ 500 बिलियन डॉलर तक बढ़ाएंगे।
    अब 6 फरवरी, 2026 के व्यापार समझौते में इसे पूरी तरह से दरकिनार कर दिया और कहा गया कि भारत अगले 5 साल तक हर साल 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹9 लाख करोड़) का अमेरिकी सामान खरीदेगा। यानी 5 साल में 45 लाख करोड़।
    सवाल यह है कि व्यापार समझौता बराबरी के आधार पर है या जबरदस्ती के आधार पर? तो फिर मोदी सरकार इसे क्यों मान रही है?

देश जवाब मांगता है!

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